छठ घाट पर उमड़ पड़ा आस्था का जनसैलाब, भगवान सूर्य को अर्घ्य देने उठे हजारों हाथ, वातावरण में छठी मइया के जयकारे की गूंज, व्रतियों ने मंत्रोच्चार के बीच भगवान सूर्य को दिया अर्घ्य
विश्वप्रसिद्ध छठ महापर्व पर हजारों की संख्या में जुटें श्रद्धालु, भक्तिमय से ओतप्रोत रहा संपूर्ण वातावरण, चार दिवसीय छठ पर्व का हुआ समापन
प्रचंड प्रहार/बिलासपुर। विश्व प्रसिद्ध छठ महापर्व की महिमा अपार है, जिसे मनाने छठ व्रतियों में अत्यंत श्रद्धा भक्ति व उत्साह बना रहता हैं। वैसे तो छठ पूजा के प्रत्येक दिन का अपना अलग महत्व है। लेकिन इस पर्व के तीसरे दिन का खास महत्व रहता हैं, चूंकि इस दिन छठ व्रतियों के द्वारा सूर्य देव को संध्या अर्घ्य (सायंकाल के समय दिया जाने वाला अर्घ्य) अर्पित किया जाता हैं। इस दिन व्रती किसी जलाशय या नदी में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं और छठी मैया से सुख समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते है। अर्घ्य देने के दौरान भगवान सूर्य और छठी मैया की विशेष पूजा आराधना की जाती हैं ।

‘नहाय खाय’ से होती हैं व्रत की शुरुआत
छठ व्रत में सूर्यदेव और षष्ठी माता की खास पूजा की जाती है, इनका बड़ा महत्व है । छठ मैया जो निःसंतानों को संतान देती हैं और संतानों की रक्षा करती हैं। उन्हें स्वस्थ और दीर्घायु बनाती हैं। कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को छठ व्रत की शुरुआत ‘नहाय खाय’ के साथ होती है। इस दिन व्रत करने वाले और घर के अन्य सदस्य अरवा चांवल, चना दाल और कद्दू से बने व्यंजन प्रसाद के तौर पर ग्रहण करते हैं। दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को शाम में मुख्य पूजा होती हैं, इसे ‘ खरना’ कहा जाता हैं। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस या गुड में बनी खीर चढ़ाई जाती हैं। कई घरों में चांवल का पीठा भी बनाया जाता हैं। तीसरे दिन संध्या में डूबते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर यह व्रत पूरा किया जाता हैं।

बाजे गाजे के साथ पहुंचे छठ व्रती
शुद्धता एवं पवित्रता के साथ बनाए ठेकुआ, खजूर, कचौनिया प्रसाद के साथ मौसमी फल नारियल, केला, मुसब्बी, संतरा, सेब, अमरूद, गाजर, मूली, ईख, अदरक, फल्ली, सिंघाड़ा सहित अन्य पूजा सामग्री को सूपा और टोकनी में सजाकर छठ व्रती एवं परिवार के सदस्य सिर पर प्रसाद से भरी टोकनी लेकर बाजे गाजे के साथ नदी के घाट पर पहुंचे, जहां व्रतियों ने नदी में स्नान कर अस्ताचल भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया और इस भावना से विनती किया कि भगवान सूर्य अभी अस्त हो रहे हैं लेकिन कल सुबह पुनः अपने समय पर उदय होकर भक्तों को दर्शन और आशीर्वाद जरूर देंगे।
परिवार और समाज की सुख समृद्धि और रक्षा का मांगा आशीर्वाद
छठ महापर्व के तीसरे दिन संध्या में डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने हजारों श्रद्धालु और छठ व्रतियों ने अरपा नदी के छठ घाट में एकत्रित होकर अपने परिवार और समाज की सुख समृद्धि और रक्षा के लिए डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर खुशहाली का आशीर्वाद मांगा। इस दौरान छठ घाट में मेले जैसा माहौल बना रहा, पर्व के दौरान भीड़ को नियंत्रित करने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। इसके अलावा पूजा समिति के पदाधिकारी और कार्यकर्ता भी पूरे समय व्यवस्था बनाने में जुटे रहे। इसमें प्रमुख रूप से पूजा समिति के प्रमुख वीएन झा, प्रवीण झा, धर्मेंद्र दास, रोशन सिंह, अभय नारायण राय आदि शामिल रहे।

डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा
छठ महापर्व में डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने की यह परंपरा कई दशकों और पीढ़ियों से चली आ रही है। जो छठ पूजा का प्रमुख भाग है। इस अवसर पर छठ व्रती महिलाएं, रंग बिरंगी पारंपरिक परिधान में सिर पर पूजा की टोकरी लेकर नदी किनारे पहुंचती हैं। और अपने परिवार की खुशहाली और समृद्धि की कामना लेकर अस्ताचल भगवान सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हैं।
उगते सूर्य को व्रतियों ने दिया अर्घ्य
शुक्रवार को सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य दिया गया, इस दिन छठ व्रतियों ने परिवार सहित सुबह के समय घाट में पहुंचकर भगवान सूर्य की आराधना की और रात भर से जलते हुए दीपक को नदी के जल में इस भावना से प्रवाहित किया कि भगवान सूर्य प्रगट होंगे और हम सबको प्रत्यक्ष दर्शन देकर प्रकाशित करेंगे। फिर नदी के जल में स्नान कर जल में ही खड़े रहकर भगवान सूर्यनारायण की आराधना में लग गए और सूर्योदय होने के साथ ही अर्घ्य देने के साथ ही यह 36 घंटे का कठिन निर्जला उपवास, अदरक और गुड़ खाकर व्रत का पारणा किया ।
शुद्धता और पवित्रता का रखा जाता है विशेष ध्यान
छठ व्रत के उपवास के दौरान शुद्धता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है, किसी भी जीव, पक्षी या जानवर द्वारा प्रसाद जूठा न हो इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है साथ ही बच्चों के द्वारा भी जाने अनजाने में किसी प्रकार की त्रुटी के लिये छठ व्रतियों द्वारा बच्चों की नादानी, गलतियों को माफ करने की विनती गीत के माध्यम से की जाती है ।



