April 15, 2026 |
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इमारती लकड़ियों की तस्करीछत्तीसगढ़बिलासपुर

यत्र – तत्र – सर्वत्र ! @ इमारती लकड़ियों की कालाबाजारी…

भारतीय वन अधिनियम की धाराओं का खुला उल्लंघन, दोषियों पर होगी उचित और प्रभावी कार्रवाई?

प्रचंड प्रहार न्यूज/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले अंतर्गत ग्राम सोंठी से प्रतिबंधित और संरक्षित प्रजाति सागौन (टीक) के इमारती लकड़ी की तस्करी से जुड़ा एक गंभीर मामला प्रकाश में आया है ।
दरअसल मंगलवार को मोपका पुलिस ने एक मालवाहक गाड़ी पकड़ा, जिसमें अवैध तरीके से इमारती लकड़ी की तस्करी की जा रही थी। पुलिस ने इस मामले में जब पूछताछ शुरू की तो उन्हें पता चला कि वन विभाग के डिप्टी रेंजर सूरज मिश्रा ने इसे मंगाया हैं। बहरहाल पुलिस ने लकड़ी, वाहन और ड्राइवर को कागजी कार्रवाई के बाद वन विभाग को सौंप दिया है।

क्या है पूरा मामला ?

मंगलवार को मोपका चौकी क्षेत्र में पुलिस ने एक पिकअप वाहन को रोककर जांच की, उसमें इमारती लकड़ी से बना दरवाजा, चौखट और शिलपट भरा था। जिसके बाद पुलिस ने थाने ले जाकर वाहन चालक से लकड़ी के संबंध में पूछताछ शुरू की, जिस पर वाहन चालक के द्वारा कोई वैध दस्तावेज नहीं दिखा पाने की स्थिति में लकड़ी, वाहन और ड्राइवर को कागजी कार्रवाई के बाद वन विभाग को सौंप दिया।

पूछताछ के दौरान ड्राइवर ने जानकारी दी कि यह इमारती लकड़ी बिलासपुर वनमंडल के अंतर्गत सोंठी जंगल से काटी गई है और डिप्टी रेंजर सूरज मिश्रा ने मंगाया है और उसे सोंठी से बिलासपुर छोड़ने के लिए केवल एक हजार रुपए भाड़ा मिलेगा। जिसके कुछ समय बाद सूरज मिश्रा खुद मौके पर पहुंचे और एक फर्जी बिल दिखाकर लकड़ी को छुड़ाने की कोशिश की। बताया जा रहा है कि इससे पहले कि वे वाहन को ले जा पाते, वन विभाग की उड़नदस्ता टीम मौके पर पहुंच गई। टीम के द्वारा लकड़ी से भरा पिकअप जप्त कर उसे बिलासपुर वन विभाग कार्यालय लाया गया।

जहां पकड़े गए गाड़ी के ड्राइवर सुखदेव केवट पिता गोपाल परसापानी, सुखीराम पिता अवधराम साजापाली, संतोष यादव पिता देवीप्रसाद बिटकुला और रामचरण गोंड पिता लोकनाथ के खिलाफ कार्रवाई की गई। बताते चले कि बहुमूल्य इमारती लकड़ी सागौन की तस्करी जैसा गंभीर मामला सामने आने के बाद यह चर्चा भी जोरो पर है कि वन विभाग के कई अधिकारी भी इस धंधे में लिप्त है। जंगल में लकड़ी कटवाते है और वहीं के स्थानीय बढ़ई से दरवाजा, चौखट, सोफा और अलमारी बनवाकर शहर में बिकवा रहे रहे है। जो कि भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 26, धारा 33, और धारा 41 का स्पष्ट उल्लंघन प्रतीत होता है।

क्या कहती हैं कानूनी धाराएँ और सजा का प्रावधान…

धारा 26: भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 26, आरक्षित वनों में कुछ कार्यों को प्रतिबंधित करती है। ये कार्य, जैसे कि खेती करना, पेड़ों को काटना, भूमि को साफ करना, या कोई और ऐसा कार्य जो वन को नुकसान पहुँचाता हो, अवैध हैं। यदि कोई व्यक्ति इस धारा का उल्लंघन करता है, तो उसे दंडित किया जा सकता है, जिसमें 6 महीने तक की जेल या 500 रुपये तक का जुर्माना शामिल है, या दोनों भी।

धारा 33: भारतीय वन अधिनियम 1927 का एक महत्वपूर्ण प्रावधान है जो वन संसाधनों की रक्षा और वन भूमि उपयोग के नियमों के प्रवर्तन से संबंधित है।
धारा 33 के तहत, कोई भी व्यक्ति जो धारा 30 के तहत अधिसूचना या धारा 32 के तहत नियमों का उल्लंघन करता है, उसे दो साल तक की कैद या 5000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों से दंडित किया जा सकता है। यदि ऐसा अपराध दूसरी बार या बाद में होता है, तो सजा दो साल तक की कैद और 10,000 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति बिना अनुमति के संरक्षित वन में पेड़ काटता है, तो वह धारा 33 के तहत दंडनीय होगा।

धारा 41: भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 41 के तहत बनाए गए नियमों के उल्लंघन पर सजा छह महीने तक की कैद या 500 रुपये तक का जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं. यह दंड राज्य सरकार द्वारा निर्धारित नियमों के उल्लंघन पर लागू होता है, जो इमारती लकड़ी और अन्य वन उपज के पारगमन को विनियमित करने के लिए बनाए जाते हैं. उदाहरण स्वरुप मान लीजिए कि कोई व्यक्ति बिना उचित अनुमति के वन क्षेत्र से इमारती लकड़ी ले जा रहा है, तो यह नियम के उल्लंघन के बराबर है और सजा दी जा सकती है। साथ ही वाहन, औजार और लकड़ी को जब्त करने का अधिकार भी वनविभाग को होता है ।

वन अफसरों की भूमिका संदिग्ध…

पुलिस की इस कार्रवाई के बाद बिलासपुर वनमंडल के अफसरों की भूमिका पर सवाल उठने लगे है। बताते चलें कि इस क्षेत्र की जंगलों में सागौन जैसे इमारती पेड़ बहुतायत मात्रा में है। जिसकी निगरानी की जिम्मेदारी वन विभाग के अफसरों पर है। लेकिन क्षेत्र के जंगलों में बड़े पैमाने पर इमारती लकड़ियों की कटाई अनवरत जारी है। इसके बाद भी विभाग के अफसर तस्करों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करते और तस्कर बेखौफ होकर इमारती लकड़ियों की तस्करी कर रहे हैं । जिस विभाग के जिम्मे जंगल और वन्य प्राणियों की रक्षा की जिम्मेदारी है उसी विभाग के अधिकारी, कर्मचारी लकड़ी तस्करी के धंधे में शामिल हो गए है। यह मामला न केवल विभाग की साख पर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि जिन पर जंगलों की सुरक्षा का जिम्मा है, वही जंगलों के सबसे बड़े दुश्मन बनते जा रहे हैं ? इस घटना ने वन विभाग की कार्यप्रणाली और अंदरूनी भ्रष्टाचार को एक बार फिर उजागर कर दिया है।

पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले…

यह कोई पहला मामला नहीं है। पहले भी ऐसे मामले सामने आए हैं। जिसमें लकड़ी काटकर, फर्नीचर बनाने और उसे बेचने की घटनाएं सामने आई हैं। कुछ माह पहले ही पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह के निर्देश पर अवैध कारोबार करने वालों के खिलाफ प्रहार अभियान के तहत छापेमारी कार्रवाई करते हुए ग्राम लमकेना में फर्नीचर का काम करने वाले दो लोगों के घर से सागौन, साल का चिरान और इन लकड़ियों से बने फर्नीचर बड़ी मात्रा में बरामद किए गए थे। जिसकी कीमत करीब 12 लाख रुपए बताई गई थी।

क्या होगी निष्पक्ष जांच और उचित कार्रवाई ?

मामले की जांच अब वन विभाग के पास है, जिसकी जांच पड़ताल भी शुरू हो गई है। जिसके बाद वह उम्मीद जताई जा रही है कि इस गंभीर मामले की तह तक जाकर जल्द ही पूरे प्रकरण का खुलासा कर दोषियों पर उचित और प्रभावी कार्रवाई की जाएगी। जो अवैध कार्य करने वाले लोगों के लिए एक सबक होगा । लेकिन बड़ा सवाल यह है: क्या विभाग अपने ही दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई करेगा या फिर एक बार फिर लीपापोती कर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा ?

क्रमशः

Prachand Prahar

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