न्यायधानी में बेशकीमती शासकीय भूमि की बिक्री, 3 करोड़ रूपये का बंदरबांट ?
भूमाफिया सहित राजस्व अधिकारी और निगम अधिकारियों पर 3 करोड़ रूपये के बंदरबांट का आरोप* *20 वर्ष पूर्व से मकान बनाकर रह रहे लोगों पर आवास का संकट ?* *नही थम रहा रिश्वत लेकर सीमांकन करने का सिलसिला*

बिलासपुर। न्यायधानी में इन दिनों जहां भूमाफियों पर ताबड़तोड़ कार्यवाही की जा रही है । जिसे लेकर भूमाफियाओं के हौसले पस्त होते नज़र आ रहे है तो वही दूसरी तरफ कुछ राजस्व एवं निगम अधिकारी के द्वारा भूमाफियों के साथ मिलीभगत कर बतौर राजस्व अभिलेखों के साथ लगभग 20 वर्ष पूर्व से मकान बनाकर रह रहे लोगो के मकानों को जमींदोज करने के प्रयास का मामला उजागर हो रहा है।

कलेक्टर, कमिश्नर और महापौर से लिखित शिकायत
साईं विहार विकास समिति तिफरा सहित जनप्रतिनिधि और स्थानीय लोगो (भूस्वामियों) ने इसकी लिखित शिकायत कलेक्टर, कमिश्नर और महापौर से की है। जिनके मुताबिक तिफरा स्थित खसरा क्रमांक 193 रकबा 50 डिसमिल शासकीय धरसा भूमि है। जो 90 फिट चौड़ा और 250 फिट लंबा है। जिस पर 30 फिट चौड़ा 250 फिट लंबा साईं विहार कालोनी का आम रास्ता निर्मित है। बचत लगभग 60× 250= 15000 वर्गफुट शासकीय धरसा की जमीन को भूमाफिया रमनदीप सलूजा, अजीत पटेल और मनोज गुप्ता ने राजस्व अधिकारियों और निगम अधिकारियों से साठगांठ करके 3 करोड़ रूपये में बेच दिया है। असंभव को संभव करने के लिए तहसीलदार, आरआई और पटवारी पर लाखों रूपये रिश्वत लेने का आरोप भी लगा है।
भूस्वामियों को भेजा गया नोटिस
बताया जा रहा हैं कि पूर्व में भी रमनदीप सलूजा, अजीत पटेल और मनोज गुप्ता के द्वारा खसरा क्रमांक 304/1 और 304/2 का सीमांकन कराया गया था जो नियम विरुद्ध और गलत साबित हो चुका है। जिसे अतिरिक्त कलेक्टर के द्वारा निरस्त भी किया जा चुका है। उसके बाद भी सब कुछ जानकर नगर तथा ग्राम निवेश के नक्शा ले आउट और पटवारी के नजरी नक्शा को दरकिनार करके कानून के पैतरो और पद का दुरूपयोग करके विधि विरुद्ध सीमांकन प्रतिवेदन बनाकर बतौर राजस्व अभिलेखों के साथ मकान बनाकर रह रहे भूस्वामियों को अवैध कब्जाधारी बना देना राजस्व अधिकारियों के बड़े भ्रष्टाचार को उजागर कर रहा है।

तिफरा हल्का पटवारी अंतर्गत खसरा क्रमांक 194 और 195 निजी भूमि जिस पर कई वर्षों पूर्व से मकान निर्मित है। उसे शासकीय धरसा की भूमि दर्शा दिया गया है। लगभग 20 वर्ष पूर्व से निर्मित मकान में रहने वाले भूस्वामियों आम नागरिकों के शांति भरे जीवन में राजस्व अधिकारियों के उल्टे सीधे सीमांकन प्रतिवेदन ने ख़लल डाल दिया है। नगर निगम के द्वारा 20 वर्ष पूर्व से मकान बनाकर रह रहे भूस्वामियों को अब नोटिस भेजकर धमकाया भी जा रहा है। जबकि उसी नगर निगम ने इन भूस्वामियों को मकान बनाने का नक्शा पास किया है। इनके द्वारा कई वर्षों से संपत्ति कर भी पटाया जा रहा है।
लगातार 2 वर्षों से की जा रही शिकायत
बताया जा रहा है घुरू प.ह.न 61 सकरी तहसील अन्तर्गत खसरा क्रमांक 304/1 और 304/2 की भूमि को रमनदीप सलूजा और अजित पटेल ने क्रय किया और उसी निजी भूमि के साथ ग्राम तिफरा के शासकीय धरसा भूमि खसरा क्रमांक 193 को निजी दर्शाकर अवैध प्लाटिंग करके खपा दिया। अब खुद को बचाने के लिए रंग रूप के कानूनी दांव पेंच का इस्तेमाल करके रिश्वत देकर कानूनी शिकंजा से बचने का प्रयास कर रहे है। जबकि इनके खिलाफ लगभग साईं विहार समिति के द्वारा लगातार 2 वर्षों से शिकायत किया जा रहा है फिर भी इन भूमाफियों के खिलाफ कार्यवाही करने में अधिकारियों के पसीने छूट रहे है । शायद इसलिए अधिकारी अवैध प्लाटिंग और सरकारी जमीन बचने वाले भूमाफियों को बचाने में लगे है। और शिकायतकर्ता कॉलोनाइजर केसरी सिंह राजपाल को उल्टा बदनाम किया जा रहा है।
पूर्व में कॉलोनाइजर केसरी सिंह राजपाल द्वारा ग्राम तिफरा पटवारी हल्का नंबर 40 स्थित खसरा क्रमांक 198/3 रकबा 47 डिसमिल भूमि का नगर तथा ग्राम निवेश से वर्ष 2004 में ले आउट पास कराया गया है। ले आउट के अनुसार धरसा भूमि 90 फिट चौड़ा है।

अधिकारियों और भूमाफियों की लापरवाही का भरपाई क्या आम नागरिक भरेंगे ?
क्या होता? यदि यह सीमांकन अगर रमनदीप सलूजा और अजित पटेल के पक्ष में नहीं होता तो इन लोगों ने जिन लोगों को जो अवैध प्लाट बेचा है वे लोग इन लोगों के खिलाफ शिकायत करने शासकीय दफ्तर पहुंच जाते? शायद इसलिए अपने आप को बचाने कानूनी दांव पेंच तो हर कोई चलता ही है? लेकिन यह प्रश्न उठता है कि जब निगम ने रजिस्ट्री पर रोक लगाया था तो फिर घुरू के खसरा क्रमांक 304/1 और 304/2 और शासकीय धरसा भूमि का टुकड़ों में रजिस्ट्री और नामांतरण कैसे हो गया? अवैध प्लाटिंग कैसे हो गया? जिला पंजीयक और उप पंजीयक तखतपुर ने रजिस्ट्री रोक के बावजूद पंजीयन होने क्यों दिया? तहसीलदार ने नामांतरण कैसे कर दिया? क्या अधिकारियों की मिलीभगत और नगर निगम के सुस्त रवैया की भरपाई अब आम नागरिक जो लोग यहां जमीन खरीदे है उन्हें भरना पड़ेगा? या फिर तिफरा हल्का खसरा क्रमांक 194 और 195 के भूस्वामी इसकी भरपाई करेंगे? या फिर कमिश्नर, कलेक्टर और महापौर की उपस्थिति में पुनः निष्पक्ष सीमांकन कराकर आम नागरिकों के साथ न्याय किया जाएगा? अब देखना होगा कि कमिश्नर और कलेक्टर शासकीय जमीन बेचने वाले दोषी भूमाफियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाते है? गलत सीमांकन करके भ्रष्टाचार को अंजाम देने वाले अपने मातहत अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्यवाही करते है? अधिकारी इस गंभीर मामले में सुध ले या नही? लेकिन यह मामला ठंडे बस्ते में जाने वाला नही है क्योंकि लोग वर्षों की पूंजी लगाकर जमीन खरीदे है और लगभग 20 वर्ष से मकान बनाकर रह रहे है वे चुप बैठने वाले नही है।



