युक्तियुक्तकरण जांच में पूर्व डीईओ दोषी, प्रभारी लिपिक को क्लीनचिट पर उठे सवाल
जांच समिति ने नियमों की अनदेखी के चार मामले गिनाए; शिकायतकर्ता का दावा—जिन दस्तावेजों से डीईओ की भूमिका सामने आई, उन्हीं में लिपिक की भूमिका भी, फिर जांच का दायरा अलग क्यों?

प्रचंड प्रहार न्यूज नेटवर्क/बिलासपुर।
शिक्षा विभाग में युक्तियुक्तकरण और पदोन्नति से जुड़े विवाद की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे की भूमिका पर गंभीर सवाल सामने आए हैं। जांच समिति ने प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी के चार प्रमुख मामलों को चिन्हित किया है। वहीं स्थापना शाखा के प्रभारी लिपिक सुनील यादव की भूमिका पर कार्रवाई की अनुशंसा नहीं किए जाने से शिकायतकर्ता ने जांच के समान मापदंड पर ही सवाल खड़ा कर दिया है।

जांच समिति के अनुसार, कुछ मामलों में शिक्षकों के अभ्यावेदनों को जिला एवं संभागीय स्तर की समितियों द्वारा परीक्षण के बाद निरस्त किए जाने के बावजूद उन्हें पुनः मान्य कर पदस्थापन दिए गए। दूसरे मामले में काउंसलिंग के विपरीत पदस्थापन किए जाने की बात सामने आई। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि 27 दिसंबर 2024 के आदेश की शर्तों के मुताबिक समय पर कार्यभार ग्रहण नहीं करने पर आदेश स्वतः समाप्त माना जाना था, लेकिन बाद में संशोधित आदेश जारी किए गए। इसके अलावा वरिष्ठता क्रम की अनदेखी कर कनिष्ठ शिक्षकों को पदोन्नति और मनचाही पदस्थापना दिए जाने का मामला भी जांच में सामने आया है।
सवाल लिपिक की भूमिका पर
शिकायतकर्ता अंकित गौरहा का कहना है कि उन्होंने जांच समिति को संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराते हुए स्थापना शाखा के प्रभारी लिपिक सुनील यादव की भूमिका की भी जांच की मांग की थी। उनका दावा है कि जिन दस्तावेजों के आधार पर तत्कालीन डीईओ की भूमिका पर सवाल तय हुए, उन्हीं रिकॉर्ड में स्थापना शाखा की भूमिका भी दिखाई देती है।

हालांकि जांच समिति ने सुनील यादव के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा नहीं की। रिपोर्ट में संबंधित आदेशों पर उनके हस्ताक्षर का उल्लेख है, लेकिन केवल दो आदेशों में हस्ताक्षर पाए जाने के आधार पर उनके विरुद्ध कार्रवाई की अनुशंसा उचित नहीं मानी गई। साथ ही विभाग को नियमों के आधार पर आवश्यक कार्रवाई करने का विकल्प खुला रखा गया है।
यही बिंदु शिकायतकर्ता के लिए सबसे बड़ा सवाल है— यदि एक ही प्रक्रिया और दस्तावेजों में अलग-अलग स्तर के अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका है, तो जिम्मेदारी तय करने का पैमाना क्या सभी पर समान रखा गया?
पुराने मामले का भी हवाला
गौरहा ने करीब तीन वर्ष पुराने एक प्रकरण का हवाला देते हुए दावा किया है कि उस मामले में भी सुनील यादव की भूमिका पर सवाल उठे थे और कार्रवाई की सिफारिश की गई थी, लेकिन कार्रवाई तत्कालीन खंड शिक्षा अधिकारी एमएल पटेल पर हुई। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध दस्तावेजों से नहीं हुई है, इसलिए इसकी भी जांच आवश्यक है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि “हर बार जांच की आंच अधिकारी तक पहुंचती है, लेकिन स्थापना शाखा का बाबू बच जाता है।”
मंत्री से करीबी के आरोप, लेकिन पुष्टि नहीं
सुनील यादव के शिक्षा मंत्री से कथित करीबी संबंधों को लेकर भी शिकायतकर्ता ने सवाल उठाए हैं और इसे कार्रवाई से बचने की वजह बताया है। हालांकि राजनीतिक करीबी या किसी कार्रवाई को प्रभावित करने के इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इसे फिलहाल आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
गौरहा का यह भी दावा है कि सुनील यादव के खिलाफ अलग-अलग स्तरों पर करीब 150 से 200 शिकायतें की गई हैं, जिनमें प्रतिनियुक्ति, स्थानांतरण-पदस्थापना और विकल्प से जुड़े मामले शामिल हैं। कमिश्नर, सचिव, कलेक्टर और मंत्री स्तर तक शिकायतें पहुंचने का भी दावा किया गया है। इन शिकायतों की वास्तविक संख्या और उनके निष्कर्ष भी विभागीय रिकॉर्ड से स्पष्ट किए जाने की जरूरत है।
अब विभाग से स्पष्ट जवाब की अपेक्षा
कलेक्टर द्वारा सुनील यादव के खिलाफ जांच के निर्देश दिए जाने के बाद उनके स्थान पर चपरासी से स्थापना शाखा का काम कराने का आरोप भी शिकायतकर्ता ने लगाया है। इस दावे की भी स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है।
पूरे मामले में मूल सवाल यही है कि क्या नियमों के उल्लंघन के लिए केवल अंतिम आदेश जारी करने वाले अधिकारी की जिम्मेदारी तय होगी, या प्रक्रिया में शामिल प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका भी समान रूप से जांची जाएगी?
जांच समिति ने तत्कालीन डीईओ की भूमिका पर गंभीर आपत्तियां दर्ज की हैं, लेकिन स्थापना शाखा की भूमिका और शिकायतकर्ता द्वारा उठाए गए सवालों का पूरी तरह स्पष्ट होना अभी बाकी है। ऐसे में विभाग के लिए जरूरी है कि वह दस्तावेजों के आधार पर यह स्पष्ट करे कि किसकी क्या भूमिका थी, किस स्तर पर निर्णय लिया गया और कार्रवाई का आधार क्या रहा।
“क्योंकि निष्पक्ष जांच का अर्थ केवल दोषी तय करना नहीं, बल्कि सभी संबंधित भूमिकाओं की समान कसौटी पर जांच करना भी है।”



