October 23, 2026 |
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दो रावण दहन, दो हादसे… सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल? अब जवाबदेही की अग्निपरीक्षा!

पुलिस ग्राउंड में पत्रकारों के झुलसने की खबर, साइंस कॉलेज मैदान में रॉकेट फटने से अफरा-तफरी; कांग्रेस नेता अंकित गौरहा ने उठाए सुरक्षा व्यवस्था और ठेका प्रक्रिया पर सवाल, 24 लाख रुपये के टेंडर की जांच की मांग

प्रचंड प्रहार न्यूज नेटवर्क/बिलासपुर।

विजयादशमी पर रावण दहन के साथ बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया गया, लेकिन बिलासपुर के दो सार्वजनिक आयोजनों में सामने आई घटनाओं ने सुरक्षा इंतजामों की समीक्षा जरूरी बना दी है। पुलिस ग्राउंड में आतिशबाजी के दौरान पत्रकारों सहित कुछ लोगों के झुलसने की खबर सामने आई, जबकि बेलतरा विधानसभा क्षेत्र के साइंस कॉलेज मैदान में रॉकेट फटने से अफरा-तफरी की स्थिति बनने की जानकारी दी गई। अब कांग्रेस नेता अंकित गौरहा ने इन घटनाओं के संदर्भ में सुरक्षा व्यवस्था, ठेका शर्तों और प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं।

दोनों घटनाएं अलग-अलग स्थानों पर हुईं, इसलिए उनकी जांच भी अलग-अलग तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर होनी चाहिए। सवाल यह नहीं कि उत्सव क्यों आयोजित हुआ, बल्कि यह है कि आयोजन के दौरान सुरक्षा के क्या इंतजाम थे, उनका पालन किसने सुनिश्चित किया और घटना के बाद जिम्मेदारी तय करने के लिए क्या कदम उठाए गए।

पहली घटना: पुलिस ग्राउंड में पत्रकारों सहित लोगों के झुलसने की खबर

बिलासपुर के पुलिस ग्राउंड में आयोजित रावण दहन कार्यक्रम में विधायक अमर अग्रवाल, महापौर पूजा विधानी, कलेक्टर, एसपी, पत्रकारों और बड़ी संख्या में नागरिकों की मौजूदगी बताई गई। इसी आयोजन के दौरान आतिशबाजी से जुड़े हादसे में पत्रकार राकेश मिश्रा और शेख अशलम सहित कुछ लोगों के झुलसने की खबर सामने आई।

इस घटना के बाद प्रमुख सवाल हैं कि आतिशबाजी के संचालन की जिम्मेदारी किसे सौंपी गई थी, दर्शकों से सुरक्षित दूरी बनाए रखने के क्या इंतजाम थे और आयोजन से पहले सुरक्षा व्यवस्था का निरीक्षण किया गया था या नहीं। घटना की परिस्थितियों, प्रभावित लोगों की स्थिति और सुरक्षा संबंधी संभावित चूक की पुष्टि आधिकारिक जानकारी तथा जांच अभिलेखों से की जानी चाहिए।

दूसरी घटना: साइंस कॉलेज मैदान में रॉकेट फटने से अफरा-तफरी

बेलतरा विधानसभा क्षेत्र के साइंस कॉलेज मैदान में आयोजित रावण दहन कार्यक्रम के दौरान आतिशबाजी में रॉकेट फटने से अफरा-तफरी की स्थिति बनने की जानकारी सामने आई। इस आयोजन में केंद्रीय मंत्री तोखन साहू की मौजूदगी बताई गई।

इस घटना को पुलिस ग्राउंड के हादसे से जोड़कर एक ही निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। दोनों स्थानों की व्यवस्थाएं, आतिशबाजी के संचालन की परिस्थितियां, सुरक्षा प्रबंध और आयोजकों की जिम्मेदारियां अलग-अलग जांच का विषय हैं। प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि इस घटना में किसी को चोट आई या नहीं, सुरक्षा संबंधी कौन-से प्रावधान लागू थे और किसी उल्लंघन की पुष्टि हुई है या नहीं।

अंकित गौरहा के सवाल: सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी?

कांग्रेस नेता अंकित गौरहा ने सार्वजनिक आयोजनों में आम नागरिकों, पत्रकारों और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा को गंभीर विषय बताते हुए जवाबदेही तय करने की मांग उठाई है। उनका सवाल है कि जब बड़े स्तर पर आयोजन किए जाते हैं, तब सुरक्षा मानकों के पालन और निगरानी की जिम्मेदारी किसकी होती है तथा हादसों के बाद संबंधित पक्षों की भूमिका की जांच कैसे की जाती है।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट होना चाहिए—गौरहा द्वारा उठाए गए सवाल और मांगें राजनीतिक नेता का पक्ष हैं, जबकि हादसों के कारण, संभावित लापरवाही और जिम्मेदार पक्षों का निर्धारण जांच तथा दस्तावेजों के आधार पर ही किया जा सकता है।

जिला प्रशासन को दोनों घटनाओं की जांच की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। यदि जांच या कार्रवाई शुरू हो चुकी है, तो उसके बारे में आधिकारिक जानकारी दी जाए। यदि अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है, तो उसकी स्थिति और आगे की प्रक्रिया बताई जाए।

24 लाख रुपये के टेंडर पर सवाल, दस्तावेजों से हो स्थिति साफ

साइंस कॉलेज मैदान के आयोजन से संबंधित बताए जा रहे 24 लाख रुपये के टेंडर को लेकर भी जांच की मांग उठाई गई है। इसके साथ पुलिस ग्राउंड के आयोजन के ठेके और उनकी शर्तों की समीक्षा का सवाल भी महत्वपूर्ण है।

जांच में यह देखा जाना चाहिए कि संबंधित कार्यादेश में सुरक्षा के क्या प्रावधान थे, आतिशबाजी संचालन की जिम्मेदारी किसे दी गई थी, आवश्यक अनुमति और सुरक्षा व्यवस्थाएं पूरी थीं या नहीं तथा निगरानी के लिए किस अधिकारी या संस्था को जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

टेंडर की राशि अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है। इसी तरह, हादसा होना भी अपने आप में किसी ठेकेदार या अधिकारी की दोषसिद्धि नहीं है। लेकिन यदि सुरक्षा संबंधी शर्तों के उल्लंघन या लापरवाही के प्रमाण मिलते हैं, तो जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। भुगतान की समीक्षा भी अनुबंध की शर्तों और लागू नियमों के अनुरूप होनी चाहिए।

‘मेवा-सदन’ संदर्भ: राजनीतिक आरोप से आगे, प्रमाणों की कसौटी जरूरी

मामले में ‘मेवा-सदन संस्कृति’ का उल्लेख करते हुए कथित राजनीतिक प्रभाव और प्रभावशाली लोगों के प्रति संभावित नरमी पर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, उपलब्ध विवरण के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि किसी राजनीतिक संबंध या प्रभाव के कारण कार्रवाई रोकी गई है अथवा किसी व्यक्ति को अनुचित लाभ पहुंचाया गया है।

इस संदर्भ में प्रशासनिक पारदर्शिता ही सबसे प्रभावी जवाब हो सकती है। संबंधित ठेकों, कार्यादेशों, सुरक्षा संबंधी अभिलेखों और कार्रवाई की स्थिति को नियमों के अनुसार सार्वजनिक किया जाए। यदि किसी प्रकार का पक्षपात, अनुचित दबाव या प्रक्रिया में अनियमितता सामने आती है, तो उसके प्रमाणों के आधार पर कार्रवाई की जाए।

राजनीतिक संबंधों को लेकर उठे सवाल जांच का विषय हो सकते हैं, लेकिन उन्हें प्रमाणित तथ्य की तरह प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। प्रशासन की निष्पक्षता का आकलन उसके निर्णयों, दस्तावेजों और कार्रवाई से होना चाहिए, न कि केवल आरोपों या आशंकाओं से।

प्रचंड प्रहार: उत्सव समाप्त, जवाबदेही का सवाल बाकी

दो स्थानों पर सामने आई घटनाएं सार्वजनिक आयोजनों की सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर समीक्षा की जरूरत बताती हैं। अब जिला प्रशासन के सामने तीन स्पष्ट जिम्मेदारियां हैं—दोनों घटनाओं की अलग-अलग जांच, सुरक्षा और ठेका संबंधी दायित्वों का निर्धारण तथा जांच के निष्कर्षों की पारदर्शी जानकारी।

कांग्रेस नेता अंकित गौरहा के सवालों का जवाब भी तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर मिलना चाहिए। यदि लापरवाही हुई है, तो जिम्मेदार पक्षों पर कार्रवाई हो; यदि सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था, तो जांच से यह भी स्पष्ट हो।

रावण दहन के बाद पुतले की राख मिट्टी में मिल जाती है, लेकिन सुरक्षा में चूक के सवालों को खामोशी में नहीं मिलाया जाना चाहिए। जनता को आरोपों का शोर नहीं, जांच का सच और जवाबदेही का परिणाम चाहिए।

Prachand Prahar

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