दिल बचाने निकले हजार लोग, अब सवाल—इलाज की पहुंच कितनों तक?
अपोलो की मेगा वॉकाथॉन में स्वास्थ्य मंत्री ने किया फ्लैग-ऑफ; 4 किमी की पदयात्रा में जागरूकता का संदेश, लेकिन आयुष्मान उपचार की घोषणा ने खड़े किए बड़े सवाल

प्रचंड प्रहार न्यूज नेटवर्क/बिलासपुर।
विश्व हृदय दिवस पर बिलासपुर में हजार से ज्यादा लोग चार किलोमीटर पैदल चले। संदेश था—दिल को स्वस्थ रखिए, नियमित व्यायाम कीजिए, खान-पान सुधारिए और समय पर जांच कराइए। अपोलो हॉस्पिटल्स बिलासपुर की मेगा वॉकाथॉन को स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने हरी झंडी दिखाई। अपोलो सिटी सेंटर से शुरू हुई यह पदयात्रा अरपा रिवर व्यू पर समाप्त हुई।

लेकिन इस आयोजन की असली खबर सिर्फ इतनी नहीं कि एक हजार लोग चले। असली सवाल उस घोषणा में छिपा है, जिसमें अपोलो प्रबंधन ने भविष्य में हृदय रोगों से जुड़े उपचार को आयुष्मान भारत योजना के दायरे में उपलब्ध कराने की दिशा में काम करने की बात कही।
यानी जागरूकता का संदेश आज, जबकि जरूरतमंद मरीजों के लिए उपचार की पहुंच का सवाल अभी भी भविष्य की घोषणा में? चार किलोमीटर की वॉक से दिल मजबूत होने का संदेश तो दिया गया, अब देखना यह होगा कि गंभीर हृदय रोगियों के लिए इलाज की राह कितनी आसान होती है।
वॉकाथॉन में भीड़ जुटी, अब स्वास्थ्य सुविधा की पहुंच का इम्तिहान
आयोजन में 20 से अधिक सामाजिक संगठनों और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों की भागीदारी रही। प्रशासन, पुलिस, चिकित्सा जगत और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे। मंच से स्वस्थ जीवनशैली, पैदल चलने, संतुलित आहार, धूम्रपान से दूरी और नियमित स्वास्थ्य जांच की बातें हुईं।
बेशक, जागरूकता जरूरी है। लेकिन बिलासपुर और आसपास के ग्रामीण तथा आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लिए स्वास्थ्य जागरूकता का अगला सवाल इलाज की वहनीयता और उपलब्धता है।
हृदय रोग में केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि पैदल चलिए; सवाल यह भी है कि जब किसी मरीज को एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्टी या जटिल हृदय उपचार की जरूरत पड़े तो वह उपचार उसकी पहुंच में कितना है?
यहीं अपोलो की आयुष्मान संबंधी घोषणा महत्वपूर्ण हो जाती है।
‘भविष्य में’ आयुष्मान उपचार—कब से और किन सेवाओं पर?
कार्यक्रम में प्रबंधन की ओर से कहा गया कि भविष्य में हृदय रोग से संबंधित उपचार सेवाओं को आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया जाएगा।
यह घोषणा सुनने में बड़ी है, लेकिन खबर का सबसे जरूरी हिस्सा शायद यही है कि ‘भविष्य में’ का मतलब कब?
क्या सभी प्रमुख कार्डियक प्रक्रियाएं इसके दायरे में आएंगी? कौन-कौन सी सेवाएं उपलब्ध होंगी? पात्र मरीजों को किन शर्तों पर उपचार मिलेगा? प्रक्रिया कब से शुरू होगी? और क्या गरीब मरीजों को आधुनिक हृदय उपचार के लिए अब भी दूसरे शहरों का रुख करना पड़ेगा?
इन सवालों के स्पष्ट जवाब सामने आना बाकी हैं।
कैथ लैब में आधुनिक तकनीक, अब परिणाम मरीज के पक्ष में दिखने चाहिए
अपोलो के विशेषज्ञों ने उन्नत कैथ लैब में IVUS और रोटेशनल एथेरेक्टॉमी जैसी तकनीकों के इस्तेमाल की जानकारी दी। डॉक्टरों के मुताबिक जटिल हृदय रोगों में आधुनिक तकनीक के साथ सही मरीज का चयन और कार्डियोलॉजिस्ट तथा कार्डियक सर्जन के बीच समन्वय महत्वपूर्ण है।
अस्पताल की ओर से कार्डियक सेवाओं के विस्तार और विशेषज्ञता के दावे भी किए गए हैं।
अब स्वाभाविक रूप से सवाल यही है—तकनीक जितनी आधुनिक हो रही है, उसकी पहुंच भी उतनी ही व्यापक होगी या वह सुविधा मुख्यतः भुगतान करने में सक्षम मरीजों तक सीमित रहेगी?
यही वह बिंदु है जहां कॉर्पोरेट स्वास्थ्य सेवा और जनस्वास्थ्य की जरूरतें आमने-सामने दिखाई देती हैं।
चार किलोमीटर की वॉक से आगे की असली यात्रा
विश्व हृदय दिवस पर निकली वॉकाथॉन ने लोगों को स्वस्थ रहने का संदेश जरूर दिया। लेकिन दिल की बीमारी से जूझ रहे मरीज के लिए असली यात्रा चार किलोमीटर की नहीं होती।
उसकी यात्रा जांच से शुरू होकर उपचार, खर्च, उपलब्ध विशेषज्ञ, अस्पताल की सुविधाओं और इलाज की निरंतरता तक जाती है।
इसलिए अपोलो का आयोजन केवल ‘दिल के लिए चलें’ के संदेश तक सीमित न रहे तो इसका जनहित कहीं ज्यादा बड़ा होगा। जागरूकता की वॉक खत्म हो चुकी है, अब इलाज को आम मरीज तक पहुंचाने की दौड़ शुरू होने का इंतजार है।
फिलहाल अपोलो का संदेश है—“दिल के लिए चलें, सेहत के लिए जुड़ें।”
जनता की ओर से अगला सवाल शायद यह होना चाहिए—
“दिल के इलाज के लिए कितनी दूर चलना पड़ेगा?”



