कड़ाही तक पहुंचा चीतल… जंगल की निगरानी पर बड़ा सवाल?
मंजूरपहरी में पका चीतल मांस मिलने पर दो आरोपी गिरफ्तार; पूछताछ में पहले भी शिकार की बात सामने आने की जांच, वन विभाग ने गश्त और मुखबिर तंत्र सक्रिय होने का किया दावा

बिलासपुर। प्रचंड प्रहार न्यूज नेटवर्क।
चीतल जंगल में कितना सुरक्षित है और वन्यजीवों की निगरानी व्यवस्था जमीन पर कितनी प्रभावी है? सीपत क्षेत्र के मंजूरपहरी गांव के दहाइतपारा में सामने आए ताजा मामले ने इन सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है।

वन विभाग की टीम ने एक घर से चीतल का पका हुआ मांस बरामद करने के बाद दो लोगों को गिरफ्तार किया है। विभाग के अनुसार, पूछताछ में आरोपियों द्वारा चीतल के शिकार और उसके मांस को पकाकर खाने की बात स्वीकार किए जाने की जानकारी सामने आई है। दोनों के खिलाफ वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत कार्रवाई की गई है। मामले में आगे की जांच जारी है।
जंगल से कड़ाही तक… बीच की कड़ी अब जांच के घेरे में
इस कार्रवाई का सबसे अहम सवाल सिर्फ दो गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं है।
जांच में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि चीतल की मौत कब और कहां हुई, शिकार के लिए कौन-सा तरीका अपनाया गया और बरामद मांस का स्रोत क्या था।
वन विभाग इस बात की भी जांच कर रहा है कि मामले में कोई अन्य व्यक्ति शामिल था या नहीं और क्या चीतल का मांस गांव के अन्य घरों तक भी पहुंचा था।
यानी अब असली परीक्षा केवल गिरफ्तारी की नहीं, बल्कि पूरी घटना की कड़ी सामने लाने की है।
पहले भी सामने आ चुके हैं चीतल शिकार के मामले
बिलासपुर और आसपास के वन क्षेत्र में वन्यजीव शिकार से जुड़े मामले पहले भी सामने आ चुके हैं।
मार्च 2021 में अचानकमार टाइगर रिजर्व के शिवतराई क्षेत्र में चीतल शिकार के मामले में वन विभाग ने छह लोगों को गिरफ्तार करने और करीब 35 किलो चीतल मांस बरामद करने की जानकारी दी थी। उस मामले में शिकार के लिए बिजली के तार सहित अन्य सामग्री बरामद किए जाने की भी रिपोर्टिंग हुई थी।
वहीं 2022 में बिलासपुर क्षेत्र के मेंड्रापारा में चीतल का शिकार कर मांस बेचने के आरोप से जुड़ा मामला सामने आया था, जिसमें करीब छह किलो मांस बरामद होने और एक व्यक्ति की गिरफ्तारी की रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी।
इन पुराने मामलों को वर्तमान प्रकरण से जोड़ना उचित नहीं होगा, लेकिन ये घटनाएं एक सवाल जरूर छोड़ती हैं—
वन्यजीव अपराध के पुराने मामलों से सबक लेकर रोकथाम की व्यवस्था कितनी मजबूत हुई?
गश्त के बावजूद घटना सामने आई, तो सवाल उठना स्वाभाविक
वन विभाग का कहना है कि वन्यजीवों के शिकार को रोकने के लिए लगातार गश्त और मुखबिर तंत्र सक्रिय रखा गया है तथा जंगल और उसके आसपास शिकार की सूचना मिलने पर तत्काल कार्रवाई की जाती है।
मंजूरपहरी में हुई कार्रवाई भी इसी सूचना तंत्र और संयुक्त कार्रवाई का परिणाम बताई गई है।
लेकिन इसके बावजूद यदि जांच में चीतल के अवैध शिकार की पुष्टि होती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—
क्या संवेदनशील वन क्षेत्रों में बीटवार निगरानी पर्याप्त है?
क्या गश्त का दायरा और प्रभावशीलता लगातार बढ़ाई जा रही है?
क्या पुराने मामलों से जुड़े संभावित तरीकों और गतिविधियों पर भी निगरानी रखी जा रही है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या विभाग शिकार के बाद कार्रवाई से आगे बढ़कर शिकार होने से पहले ही उसे रोकने की व्यवस्था को और मजबूत कर सकता है?
कार्रवाई हुई, अब जांच की दिशा महत्वपूर्ण
मंजूरपहरी मामले में गिरफ्तार दोनों व्यक्ति फिलहाल आरोपी हैं। उन्हें न्यायालय द्वारा दोषी ठहराया जाना अभी बाकी है। इसलिए अंतिम दोषसिद्धि न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही मानी जाएगी।
अब जांच में यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि कथित शिकार की घटना वास्तव में कहां हुई, उसमें कौन-कौन से साधन इस्तेमाल हुए, मांस कहां से आया और क्या मामले में अन्य लोगों की कोई भूमिका थी।
यदि जांच में पहले भी इसी क्षेत्र में वन्यजीव शिकार की बात सामने आती है, तो उस पहलू की स्वतंत्र पुष्टि और आवश्यक कार्रवाई भी महत्वपूर्ण होगी।
प्रचंड प्रहार का सवाल
कड़ाही तक चीतल का मांस पहुंचने के बाद दो आरोपी गिरफ्तार हो गए… लेकिन वन्यजीव जंगल से घर तक पहुंचा कैसे?
वन विभाग की कार्रवाई निश्चित रूप से कानून के पालन की दिशा में कदम है। लेकिन वन्यजीव संरक्षण की असली कसौटी यह भी है कि अगली बार शिकार होने से पहले ही सूचना तंत्र, गश्त और निगरानी उसे रोक सके।
क्योंकि सवाल सिर्फ आज पकड़े गए दो आरोपियों का नहीं—
सवाल यह है कि जंगल में रहने वाला चीतल अगली बार कड़ाही तक पहुंचे ही नहीं, इसके लिए व्यवस्था कितनी तैयार है?
प्रचंड प्रहार न्यूज नेटवर्क
खबर वही, जो असर करे।



