बस्तर दशहरा लोकतंत्र की मिसाल, माओवाद के बाद विकास की अग्निपरीक्षा! राष्ट्रपति मुर्मु का संदेश, अब जमीन पर बदलाव की बारी
मुरिया दरबार की परंपरा को बताया जमीनी लोकतंत्र का उदाहरण; पांच राष्ट्रपतियों से जुड़ा बस्तर का ऐतिहासिक गौरव, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आदिवासी अधिकारों पर विकास के वास्तविक नतीजे ही तय करेंगे भविष्य।

प्रचंड प्रहार न्यूज नेटवर्क/जगदलपुर/बिलासपुर।
बस्तर की पहचान को अब केवल माओवादी हिंसा और सुरक्षा चुनौतियों के संदर्भ में नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध जनजातीय संस्कृति, सामाजिक एकजुटता और लोकतांत्रिक परंपराओं के माध्यम से भी देखने की जरूरत है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर दशहरा के अवसर पर जगदलपुर में आयोजित कार्यक्रम में इस विशिष्ट विरासत को रेखांकित करते हुए उत्सव को छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक गौरव और सामूहिक आस्था का जीवंत प्रतीक बताया। मुरिया दरबार की परंपरा को उन्होंने जमीन से जुड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था का उदाहरण माना।

राष्ट्रपति का संदेश केवल सांस्कृतिक गौरव तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों के समन्वित प्रयासों से क्षेत्र माओवादी हिंसा के खतरे से मुक्त होकर विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। जनजातीय उद्यमियों को वित्तीय सहायता और बाजार से जोड़ने की पहलों का उल्लेख करते हुए उन्होंने समावेशी विकास और प्रकृति-संरक्षण पर भी जोर दिया।

पांच राष्ट्रपतियों से जुड़ा बस्तर, राष्ट्रीय पहचान का ऐतिहासिक अध्याय
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लेकर डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, प्रतिभा देवीसिंह पाटिल, रामनाथ कोविंद और वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु तक पांच राष्ट्रपतियों का बस्तर से जुड़ाव इस क्षेत्र के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करता है।
राष्ट्रपति मुर्मु ने इससे पहले बस्तर पंडुम के उद्घाटन के अवसर पर भी जनजातीय संस्कृति, परंपराओं और स्थानीय प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने का संदेश दिया था। उन्होंने माओवाद से प्रभावित दशकों के दौरान आदिवासी समाज, युवाओं और अन्य वंचित समुदायों को हुई कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए शिक्षा, बुनियादी सुविधाओं और विकास योजनाओं की भूमिका पर जोर दिया था। इन जुड़ाव का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष बस्तर की संस्कृति, जनजातीय समाज और उसकी विकास संबंधी जरूरतों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने का अवसर है।

मुरिया दरबार: परंपरा में संवाद, सहभागिता और लोकतंत्र की झलक
बस्तर दशहरा देश के अन्य दशहरा आयोजनों से अलग अपनी विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए जाना जाता है। मां दंतेश्वरी को समर्पित इस उत्सव में अनेक गांवों के देवी-देवताओं, जनजातीय समुदायों और पारंपरिक प्रतिनिधियों की सहभागिता होती है।
मुरिया दरबार इसी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। राष्ट्रपति ने स्थानीय मांझी और चालकी से संवाद के बाद इस व्यवस्था को जमीन से जुड़ी लोकतांत्रिक पद्धतियों का अच्छा उदाहरण बताया। यह टिप्पणी बस्तर की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था को सम्मान देने के साथ उस संवाद संस्कृति की अहमियत भी सामने लाती है, जिसमें समुदायों की समस्याओं और अपेक्षाओं को स्थान मिलता है।
लेकिन इस परंपरा की असली ताकत तभी बनी रहेगी, जब स्थानीय समाज की आवाज केवल सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित न रहे, बल्कि विकास योजनाओं, स्थानीय जरूरतों और प्रशासनिक निर्णयों में भी प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित हो।

माओवाद से राहत का संदेश, विकास की सफलता अब परिणामों से मापी जाए
राष्ट्रपति ने बस्तर में माओवादी हिंसा से राहत और विकास की संभावनाओं पर भरोसा जताया है। उन्होंने फरवरी में बस्तर पंडुम के दौरान उन्होंने गांवों में बिजली, सड़क और पानी की सुविधाओं के विस्तार तथा वर्षों से बंद विद्यालयों के फिर से खुलने का उल्लेख किया था। ये सकारात्मक संकेत हैं, लेकिन इसके लिए यह देखना होगा कि दूरस्थ गांवों में सुविधाओं की पहुंच कितनी नियमित है, स्कूलों में पढ़ाई की गुणवत्ता कैसी है, स्वास्थ्य सेवाएं कितनी सुलभ हैं और स्थानीय युवाओं को रोजगार के कितने स्थायी अवसर मिल रहे हैं।
हिंसा से प्रभावित परिवारों का पुनर्वास, आदिवासी समुदायों के संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों की रक्षा, वन उपज का उचित मूल्य और स्थानीय लोगों की आजीविका भी विकास की अनिवार्य कसौटियां हैं। शांति की उपलब्धि तभी स्थायी होगी, जब उसके साथ न्याय, अवसर और भरोसेमंद प्रशासन भी पहुंचे।
विकास की उड़ान: योजनाओं से आगे, गांवों तक पहुंचे लाभ
बस्तर में विकास की दिशा तय करते समय सड़क, बिजली, पेयजल और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है। जनजातीय उद्यमियों को वित्तीय सहायता और बाजार से जोड़ने की पहलें तभी प्रभावी होंगी, जब स्थानीय उत्पादकों, हस्तशिल्पियों, वन उपज संग्राहकों और छोटे कारोबारियों को वास्तविक लाभ मिले।
इसी तरह पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। मगर विकास की प्रक्रिया में प्रकृति का संरक्षण, स्थानीय परंपराओं का सम्मान और जनजातीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है। राष्ट्रपति ने स्वयं जनजातीय समाज की प्रकृति-पोषक जीवनशैली से सीख लेने की जरूरत रेखांकित की है।
प्रचंड प्रहार: राष्ट्रपति का संदेश सम्मान का, व्यवस्था के सामने जवाबदेही की कसौटी
बस्तर दशहरा की सांस्कृतिक गरिमा और मुरिया दरबार की लोकतांत्रिक परंपरा छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण विरासत हैं। राष्ट्रपति का इन परंपराओं को राष्ट्रीय मंच पर महत्व देना बस्तर के लिए सम्मान का विषय है। माओवादी हिंसा से प्रभावित क्षेत्र में शांति और विकास की संभावनाएं बढ़ना भी स्थानीय लोगों के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।
लेकिन अब सबसे जरूरी सवाल है—इस बदलाव का लाभ बस्तर के अंतिम गांव और अंतिम व्यक्ति तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंच रहा है?
क्या हर जरूरतमंद बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, हर मरीज को समय पर उपचार, हर गांव को भरोसेमंद बुनियादी सुविधाएं और हर योग्य युवा को रोजगार का अवसर मिल रहा है? क्या विकास की योजनाओं में स्थानीय समुदायों की भागीदारी और उनके अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित हो रही है? इन सवालों के जवाब आंकड़ों, योजनाओं की प्रगति और जमीनी अनुभवों से सामने आने चाहिए।
बस्तर को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में इतिहास और संस्कृति की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। अब उस पहचान को टिकाऊ विकास, सामाजिक न्याय और आम नागरिक की खुशहाली में बदलना प्रशासन और शासन की जिम्मेदारी है।
राष्ट्रपति का संदेश दिशा दिखाता है; उस दिशा में कितनी दूरी तय हुई, इसका जवाब जमीन पर दिखने वाला बदलाव ही देगा। यही बस्तर के गौरव और विकास की असली परीक्षा है।



