October 24, 2026 |
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17 दिन ‘डिजिटल अरेस्ट’ में फंसा रहा पीड़ित, साइबर संवाद में सामने आई ठगी की हकीकत

डर, दबाव और भरोसे का खेल खेल रहे साइबर ठग; बिलासपुर पुलिस के संवाद कार्यक्रम में पीड़ितों ने सुनाई आपबीती, 1930 पर तत्काल शिकायत की अपील

प्रचंड प्रहार न्यूज नेटवर्क/बिलासपुर।

साइबर ठगी अब केवल फर्जी लिंक, ओटीपी या बैंक कॉल तक सीमित नहीं रह गई है। ठग लोगों के डर, जल्दबाजी और भरोसे को हथियार बनाकर उन्हें मानसिक दबाव में लेने की कोशिश कर रहे हैं। बिलासपुर में आयोजित ‘साइबर संवाद’ कार्यक्रम में सामने आई पीड़ितों की आपबीती ने साइबर अपराध के इस बदलते तौर-तरीके की गंभीर तस्वीर पेश की।

बिलासपुर पुलिस के ‘साइबर जागृति अभियान’ के तहत 29 सितंबर को लाल बहादुर शास्त्री सभागार में आयोजित कार्यक्रम में पुलिस अधिकारियों, पीड़ितों, मीडिया, बैंकिंग क्षेत्र, व्यापारियों, सामाजिक संगठनों और विद्यार्थियों ने साइबर अपराध से जुड़े सवालों पर चर्चा की। कार्यक्रम की अध्यक्षता पुलिस महानिरीक्षक बिलासपुर रेंज रामगोपाल गर्ग तथा डीआईजी/एसएसपी रजनेश सिंह ने की।

17 दिन तक बनाया दबाव, ‘डिजिटल अरेस्ट’ का दावा

कार्यक्रम में ऐसे पीड़ितों को भी अपनी बात रखने का अवसर दिया गया, जिन्होंने साइबर ठगी की शिकायतें दर्ज कराई थीं। इनमें एक पीड़ित ने कथित ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर करीब 17 दिनों तक मानसिक दबाव में रखे जाने की घटना साझा की।

पीड़ित के अनुसार, कथित साइबर ठगों ने भय और दबाव का माहौल बनाकर उसे अपने प्रभाव में रखने की कोशिश की। पुलिस के मुताबिक शिकायत पर कार्रवाई करते हुए सरकंडा थाना पुलिस ने पीड़ित की सहायता की और उसे इस स्थिति से बाहर निकालने में मदद की। कार्यक्रम में इस घटना को साइबर ठगी के बदलते और मनोवैज्ञानिक तौर-तरीकों के उदाहरण के तौर पर सामने रखा गया।

‘ठग पहले भरोसा जीतते हैं, फिर डर पैदा करते हैं’

आईजी रामगोपाल गर्ग ने चर्चा के दौरान साइबर अपराधियों द्वारा अपनाए जाने वाले तौर-तरीकों पर जानकारी दी। वहीं एसएसपी रजनेश सिंह ने बताया कि साइबर ठगी के दौरान ठग बातचीत के जरिए व्यक्ति की कमजोरियों और परिस्थितियों को समझने का प्रयास करते हैं और फिर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर उससे आर्थिक लेन-देन करवाने की कोशिश कर सकते हैं।

यानी साइबर अपराध का बड़ा खतरा केवल तकनीक में नहीं, बल्कि मानसिक दबाव और विश्वास के दुरुपयोग में भी दिखाई देता है।

पीड़ितों की आपबीती बनी जागरूकता का आईना

कार्यक्रम में अन्य साइबर ठगी के पीड़ितों ने भी अपनी घटनाएं साझा कीं। ऑनलाइन फ्रॉड, फर्जी कॉल और कथित डिजिटल अरेस्ट जैसी घटनाओं के अनुभवों ने उपस्थित लोगों को यह समझने का अवसर दिया कि ठग किस तरह अलग-अलग परिस्थितियों में लोगों को निशाना बनाने का प्रयास करते हैं।

पुलिस अधिकारियों ने नागरिकों से संदिग्ध कॉल, लिंक, ओटीपी या व्यक्तिगत जानकारी साझा करने में सावधानी बरतने और किसी भी दबाव में तत्काल आर्थिक निर्णय नहीं लेने की अपील की।

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा भी बनी बड़ा सवाल

साइबर संवाद में बच्चों और किशोरों की ऑनलाइन सुरक्षा का मुद्दा भी उठा। व्यापारी संघ के एक सदस्य ने साइबर बुलीइंग तथा बच्चों और बच्चियों को ऑनलाइन उत्पीड़न से बचाने से जुड़े सवाल अधिकारियों के सामने रखे।

इस पर अभिभावकों से बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों को लेकर सजग रहने और उन्हें साइबर सुरक्षा की बुनियादी जानकारी देने की जरूरत पर चर्चा हुई। कार्यक्रम में यह संदेश भी सामने आया कि डिजिटल दुनिया में बच्चों की सुरक्षा केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि परिवार और समाज की साझा जिम्मेदारी है।

सवाल-जवाब के जरिए पुलिस से सीधे संवाद

कार्यक्रम में मीडियाकर्मियों ने भी साइबर अपराध की मौजूदा परिस्थितियों और उससे जुड़े विभिन्न मुद्दों पर पुलिस अधिकारियों से सवाल किए। अधिकारियों ने सवालों के जवाब देते हुए साइबर अपराध से बचाव और शिकायत की प्रक्रिया से संबंधित जानकारी साझा की।

कार्यक्रम को बिलासपुर पुलिस के आधिकारिक इंस्टाग्राम पेज के माध्यम से लाइव भी प्रसारित किया गया, ताकि सभागार से बाहर मौजूद नागरिक भी संवाद से जुड़ सकें।

1930 पर तुरंत शिकायत की अपील

एसएसपी रजनेश सिंह ने नागरिकों से अपील की कि साइबर ठगी का शिकार होने पर घबराने के बजाय तत्काल साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करें। पुलिस के अनुसार, समय पर शिकायत मिलने से ठगी की रकम को होल्ड कराने अथवा रिकवरी की संभावना बढ़ सकती है।

कार्यक्रम के समापन पर आईजी रामगोपाल गर्ग ने विद्यार्थियों से अनजान व्यक्ति, संदिग्ध लिंक, मैसेज और ऑनलाइन ऑफर पर बिना सत्यापन भरोसा नहीं करने तथा परिवार एवं आसपास के लोगों को भी साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूक करने की अपील की।

संवाद की पहल, अब जरूरत परिणाम की

‘साइबर संवाद’ ने एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर सामने रखा है—जब साइबर ठगी के तरीके लगातार बदल रहे हैं, तो जागरूकता भी उतनी ही तेज और व्यापक कैसे बने? कार्यक्रम में पुलिस ने अपने स्तर पर जागरूकता और संवाद की पहल की, जबकि पीड़ितों की आपबीती ने खतरे की वास्तविकता सामने रखी।

अब इस तरह के अभियानों की प्रभावशीलता इस बात से भी परखी जाएगी कि जागरूकता कार्यक्रमों की जानकारी आम नागरिक तक कितनी पहुंचती है, शिकायत के बाद कार्रवाई कितनी तेजी से होती है और साइबर ठगी की रकम की रिकवरी में पीड़ितों को कितना व्यावहारिक सहयोग मिलता है।

कार्यक्रम में मीडिया प्रतिनिधियों के अलावा बैंक अधिकारी, व्यापारी, सामाजिक संगठन, एनजीओ, विद्यार्थी, शिक्षक, सराफा व्यापारी तथा विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े नागरिक शामिल हुए। पुलिस विभाग की ओर से अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पंकज पटेल, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ग्रामीण मधुलिका सिंह, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ट्रैफिक रामकुमार करियारे, नगर पुलिस अधीक्षक परमेश्वर तिलकवार, रक्षित निरीक्षक भूपेंद्र कुमार गुप्ता, थाना प्रभारी कोतवाली देवेश सिंह, निरीक्षक गोपाल सतपति सहित अन्य अधिकारी-कर्मचारी मौजूद रहे।

Prachand Prahar

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