75 दिन का दशहरा, रावण दहन नहीं! मां दंतेश्वरी की आराधना में जीवंत होती बस्तर की सदियों पुरानी परंपरा
पाट जात्रा से रथयात्रा और मुरिया दरबार तक, आस्था, जनजातीय संस्कृति और लोकविश्वास का अनूठा संगम; 20 अक्टूबर को भीतर रैनी का प्रमुख आयोजन

प्रचंड प्रहार न्यूज नेटवर्क/बिलासपुर।
जगदलपुर/बिलासपुर। देशभर में दशहरा भगवान श्रीराम की विजय और रावण दहन के लिए जाना जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरे की परंपरा बिल्कुल अलग है। यहां रावण दहन नहीं होता, बल्कि लगभग 75 दिनों तक मां दंतेश्वरी की आराधना, स्थानीय देवी-देवताओं की परंपराओं, जनजातीय आस्था और विशाल काष्ठ रथयात्रा के साथ यह अनूठा महापर्व मनाया जाता है।

लगभग छह शताब्दियों से अधिक पुरानी मानी जाने वाली यह परंपरा बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां दशहरा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि विभिन्न समुदायों की सहभागिता, पारंपरिक शिल्प और पीढ़ियों से चली आ रही लोकमान्यताओं का जीवंत स्वरूप है।
पाट जात्रा से शुरू होता है 75 दिनों के पर्व का सफर
बस्तर दशहरा की शुरुआत हरेली अमावस्या पर होने वाली पाट जात्रा से होती है। इस रस्म में रथ निर्माण से जुड़ी पवित्र लकड़ी की पूजा की जाती है। इसके बाद डेरी गढ़ाई सहित विभिन्न अनुष्ठानों के माध्यम से पारंपरिक रथ निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
बस्तर दशहरा की प्रमुख रस्में और उनका महत्व
- पाट जात्रा: हरेली अमावस्या पर पवित्र लकड़ी की पूजा के साथ पर्व का शुभारंभ होता है। यह रस्म पारंपरिक रथ निर्माण से जुड़ी है।
- डेरी गढ़ाई: सिरहासार भवन में पारंपरिक विधि से लकड़ी के स्तंभ स्थापित करने की रस्म निभाई जाती है। यह रथ निर्माण प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण है।
- काछन गादी: काछन देवी की आराधना की जाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, मिरगान समुदाय की युवती देवी का प्रतीकात्मक स्वरूप धारण करती है और देवी की अनुमति से उत्सव आगे बढ़ाने की परंपरा जुड़ी है।

- कलश स्थापना: नवरात्रि के दौरान शक्ति उपासना से जुड़ा यह अनुष्ठान किया जाता है।
- जोगी बिठाई: सिरहासार भवन में साधना की परंपरा निभाई जाती है। पारंपरिक विवरणों के अनुसार, हल्बा समुदाय का साधक नौ दिनों तक योग मुद्रा में तप करता है।

- रथ निर्माण और परिक्रमा: स्थानीय कारीगर पारंपरिक तकनीक से विशाल काष्ठ रथ तैयार करते हैं। इसके बाद निर्धारित परंपरा के अनुसार रथ की परिक्रमा और संचालन होता है।
- निशा जात्रा: रात्रि में आयोजित इस अनुष्ठान में पारंपरिक पूजा-विधि, धार्मिक मान्यताओं और सामुदायिक सहभागिता का विशेष महत्व है।
- जोगी उठाई: जोगी की नौ दिवसीय साधना पूरी होने पर यह पारंपरिक रस्म निभाई जाती है।
- मावली परघाव: मावली देवी के स्वागत की परंपरा इस पर्व का महत्वपूर्ण धार्मिक पड़ाव है। मावली देवी को बस्तर की देवी परंपरा में विशेष स्थान प्राप्त है।

- भीतर रैनी: बस्तर दशहरा की प्रमुख रथ परंपराओं में शामिल इस आयोजन में विशाल काष्ठ रथ को पारंपरिक विधि से चलाया जाता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु और स्थानीय समुदाय इसमें भाग लेते हैं।
- बाहर रैनी: भीतर रैनी के बाद रथ से जुड़ी अगली परंपरा निभाई जाती है। रथ को निर्धारित स्थान पर ले जाने और उससे जुड़ी रस्मों का विशेष महत्व है।
- काछन जात्रा: काछन देवी से जुड़ी पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं और रस्मों का यह एक अन्य पड़ाव है।

- मुरिया दरबार: जनजातीय प्रतिनिधियों, मांझी-मुखियाओं और स्थानीय समुदायों की सहभागिता वाला यह आयोजन सामाजिक संवाद का मंच है। इसमें क्षेत्र की समस्याओं और जनहित के विषयों पर चर्चा की परंपरा रही है।
- कुटुंब जात्रा: पर्व में शामिल विभिन्न समुदायों और देवी-देवताओं की परंपराओं से जुड़ा यह आयोजन सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक है।
- ओहाड़ी और देवी-देवताओं की विदाई: उत्सव के समापन चरण में विभिन्न क्षेत्रों से आए देवी-देवताओं के प्रतीकों और पालकियों को पारंपरिक सम्मान के साथ विदाई दी जाती है।

2026 में कब होंगे प्रमुख आयोजन?
भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 2026 में बस्तर दशहरा की शुरुआत 12 अगस्त को पाट जात्रा से हुई। मुख्य दशहरा चरण 18 से 22 अक्टूबर तक निर्धारित है और 20 अक्टूबर को भीतर रैनी का प्रमुख आयोजन दर्ज है।
श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अलग-अलग रस्मों की सटीक तिथियों, आयोजन क्रम और यातायात व्यवस्था के लिए स्थानीय प्रशासन तथा बस्तर दशहरा समिति की नवीनतम सूचना देखनी चाहिए।
बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
बस्तर दशहरा का केंद्र मां दंतेश्वरी की आराधना, स्थानीय देवी-देवताओं की परंपराएं और जनजातीय लोकविश्वास हैं। यही कारण है कि यहां दशहरे का स्वरूप देश के अन्य हिस्सों से अलग दिखाई देता है।
इस पर्व में रथ निर्माण का पारंपरिक कौशल, लोकवाद्य, सामुदायिक सहभागिता और धार्मिक अनुष्ठान बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखते हैं। यह आयोजन याद दिलाता है कि भारत की सांस्कृतिक शक्ति उसकी विविध परंपराओं और उन्हें सहेजने वाले समुदायों में निहित है।
आस्था के साथ विरासत संरक्षण भी जरूरी
बस्तर दशहरा की भव्यता के साथ उन स्थानीय कारीगरों, कलाकारों और समुदायों का सम्मान भी जरूरी है, जो पीढ़ियों से इन परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं। पर्यटन और आयोजन की लोकप्रियता बढ़ने के साथ पारंपरिक अनुष्ठानों तथा जनजातीय सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण भी प्राथमिकता होनी चाहिए।
प्रचंड प्रहार की नजर से: बस्तर दशहरा केवल 75 दिनों का उत्सव नहीं, बल्कि मां दंतेश्वरी के प्रति श्रद्धा, जनजातीय अस्मिता और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। इसकी वास्तविक पहचान तभी कायम रहेगी, जब उत्सव की भव्यता के साथ उसकी मूल परंपराओं और स्थानीय समुदायों का सम्मान भी सुरक्षित रहेगा।
प्रचंड प्रहार न्यूज नेटवर्क, बिलासपुर खबर वही, जो असर करे।
संक्षिप्त डिस्क्लेमर: रस्मों का विवरण प्रचलित परंपराओं और उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है। प्रकाशन से पहले आयोजन की तिथियों एवं स्थानीय मान्यताओं की पुष्टि आधिकारिक स्रोतों से करें।



