
प्रचंड प्रहार न्यूज नेटवर्क/बिलासपुर।
कोनी में करीब 155 करोड़ रुपए की लागत से तैयार हो रहा 100 बेड का राज्य कैंसर संस्थान अब निर्माण के अंतिम चरण में है। करीब 90 प्रतिशत काम पूरा होने के बीच इसके संचालन को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर देने की कवायद ने अस्पताल शुरू होने से पहले ही एक अहम बहस छेड़ दी है।

सबसे बड़ा सवाल है—जब अस्पताल के संचालन के लिए क्लास-1 से क्लास-4 तक 289 पद स्वीकृत किए जा चुके हैं, तो फिर संचालन में निजी भागीदारी की जरूरत क्यों पड़ी?
संस्थान में 20 बेड कैंसर ICU और 80 बेड जनरल वार्ड प्रस्तावित हैं। करीब 20-20 करोड़ रुपए की लागत वाली दो अत्याधुनिक Linear Accelerator रेडियोथेरेपी मशीनों तथा नि:शुल्क कीमोथेरेपी जैसी सुविधाओं की भी योजना बताई गई है। परियोजना में 60 प्रतिशत केंद्र और 40 प्रतिशत राज्य सरकार की हिस्सेदारी बताई गई है।
PPP मॉडल क्या है?
PPP यानी Public Private Partnership में सरकार और निजी क्षेत्र किसी सार्वजनिक सेवा के संचालन या प्रबंधन में साझेदारी करते हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र में इसका वास्तविक स्वरूप अनुबंध की शर्तों पर निर्भर करता है।
इसलिए असली सवाल केवल PPP का नहीं, बल्कि PPP की शर्तों का है।
जनता जानना चाहेगी—गरीब मरीजों के लिए इलाज कितना सुलभ रहेगा? सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ कैसे सुनिश्चित होगा? नि:शुल्क या रियायती उपचार की व्यवस्था क्या होगी? स्वीकृत 289 पदों का क्या होगा? और निजी भागीदार की सेवा-गुणवत्ता की निगरानी कौन करेगा?
जनप्रतिनिधियों की भी परीक्षा
कैंसर संस्थान को लेकर क्षेत्र के मरीजों और उनके परिजनों की उम्मीदें बड़ी हैं। ऐसे में जनप्रतिनिधियों के सामने भी सवाल है कि वे केवल अस्पताल के निर्माण और उद्घाटन तक अपनी भूमिका सीमित रखेंगे या PPP की शर्तों, मरीजों की लागत और 289 स्वीकृत पदों की स्थिति पर भी सरकार से स्पष्ट जवाब मांगेंगे?
क्योंकि यह सिर्फ एक अस्पताल की व्यवस्था का सवाल नहीं है। 155 करोड़ का सरकारी निवेश आखिर मरीजों तक किस रूप में पहुंचेगा—यही असली कसौटी है।
अस्पताल सरकारी हो या PPP मॉडल पर चले, जनता को एक ही बात चाहिए—इलाज सुलभ हो, व्यवस्था पारदर्शी हो और मरीज की जेब इलाज की सबसे बड़ी बाधा न बने।



