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छत्तीसगढ़

गौवंश के पेट में पन्नी, नालियों में प्लास्टिक, पानी में जहर का खतरा! प्रतिबंध के बावजूद लगाम कहां?

गौमाता से वन्यजीवों तक संकट, दूषित होते जलस्रोत और दमघोंटू प्रदूषण की आशंका; हाईकोर्ट में कार्रवाई के आंकड़े पेश, अब सरकार और नगरीय निकायों से जमीनी नतीजों का हिसाब जरूरी

रायपुर – बिलासपुर | प्रचंड प्रहार न्यूज नेटवर्क।

प्लास्टिक की पन्नियां केवल कचरे का ढेर नहीं हैं। यही लापरवाही गौवंश के लिए जानलेवा खतरा, दूसरे जीवों के लिए संकट और आम जनमानस के लिए पर्यावरणीय जोखिम बन सकती है। सड़कों पर भोजन के साथ पन्नियां निगलते मवेशी, प्लास्टिक से बाधित नालियां और कचरे के अनुचित निपटान की समस्या एक सीधा सवाल खड़ा करती है—जब प्रतिबंध और कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, तो प्लास्टिक प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण की चुनौती अब भी क्यों बनी हुई है?

यह सवाल केवल राजधानी रायपुर का नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के सभी नगरीय निकायों के लिए महत्वपूर्ण है।

गौवंश के लिए जानलेवा जोखिम, दूसरे जीव भी सुरक्षित नहीं

खाने के अवशेषों के साथ प्लास्टिक निगलने से गौवंश के पाचन तंत्र में गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। आवारा पशुओं के लिए कचरे के ढेर भोजन का स्रोत बन जाते हैं, जहां खाद्य अपशिष्ट के साथ प्लास्टिक भी मौजूद रहता है। दूसरे पशु और पक्षी भी प्लास्टिक निगलने या उसमें उलझने से प्रभावित हो सकते हैं।प्लास्टिक का संकट यहीं खत्म नहीं होता। खुले में इसे जलाने से हानिकारक प्रदूषक निकल सकते हैं। नालियों में जमा प्लास्टिक जलनिकासी बाधित कर सकता है, जबकि अनुचित निपटान से प्लास्टिक कचरा नदियों और अन्य जलस्रोतों तक पहुंच सकता है। इसके छोटे कण मिट्टी और पानी में भी फैल सकते हैं।

यानी जिस पन्नी को इस्तेमाल के बाद लापरवाही से फेंक दिया जाता है, उसका नुकसान पशुओं से लेकर पर्यावरण और मानव जीवन तक पहुंच सकता है। हर स्थिति में नुकसान की मात्रा अलग हो सकती है, लेकिन इस खतरे को नजरअंदाज करना उचित नहीं।

हाईकोर्ट के निर्देश, सरकारी कार्रवाई के आंकड़े—फिर भी निगरानी जरूरी

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 13 मई 2026 को प्लास्टिक प्रदूषण के मामले में राज्य सरकार और छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल को सफाई अभियान, जनजागरूकता तथा प्रतिबंधित एकल-उपयोग प्लास्टिक के निर्माण, परिवहन और आपूर्ति के स्रोतों की पहचान कर नियमानुसार कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे।

मुख्य सचिव की ओर से 7 जुलाई को पेश अनुपालन हलफनामे में विभिन्न कार्रवाइयों का विवरण दिया गया। इसमें बिलासपुर में लगभग 386 किलोग्राम प्रतिबंधित एकल-उपयोग प्लास्टिक की जब्ती और 93,100 रुपये के जुर्माने अथवा पर्यावरण क्षतिपूर्ति तथा रायपुर में 7,26,500 रुपये की पर्यावरण क्षतिपूर्ति और एक उत्पादक के विरुद्ध आपराधिक शिकायत दर्ज करने की जानकारी शामिल थी।

8 जुलाई को हाईकोर्ट ने सरकारी प्रयासों का संज्ञान लेते हुए मामले को आगे की निगरानी के लिए 24 अगस्त 2026 को सूचीबद्ध किया था।

ये आंकड़े कार्रवाई का विवरण देते हैं, लेकिन अपने आप पूरे प्रदेश में समस्या के समाधान को प्रमाणित नहीं करते। इसी तरह, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना भी उचित नहीं होगा कि सभी निर्देशों का उल्लंघन हुआ है। जरूरत इस बात की है कि आगे की न्यायिक कार्यवाही और प्रशासनिक रिपोर्ट के साथ जमीनी स्थिति भी सामने आए।

प्रतिबंध कागज पर नहीं, बाजार और सड़कों पर दिखना चाहिए

छत्तीसगढ़ में प्लास्टिक कैरी बैग पर प्रतिबंध और केंद्र के प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के तहत अधिसूचित एकल-उपयोग प्लास्टिक पर रोक के बावजूद प्रभावी निगरानी की जरूरत बनी हुई है। यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि हर प्रकार का प्लास्टिक प्रतिबंधित नहीं है; कार्रवाई उन उत्पादों पर होनी चाहिए जिन पर लागू कानून के तहत रोक है।

राज्य सरकार, पर्यावरण संरक्षण मंडल और नगरीय निकायों को बताना चाहिए कि प्रतिबंधित सामग्री की आपूर्ति रोकने, बाजारों में निरीक्षण, कचरे के पृथक्करण और सुरक्षित निपटान के लिए क्या निरंतर व्यवस्था है। कितनी कार्रवाई हुई, कितने मामलों में नियमों के अनुसार दंड लगाया गया और सफाई अभियानों के बाद कितने क्षेत्रों में सुधार आया—इनका पारदर्शी विवरण सार्वजनिक होना चाहिए।

स्थानीय जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही भी महत्वपूर्ण है। उन्हें अपने क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन और स्वच्छता व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए। गौसंरक्षण की बात करने वाले राजनीतिक दलों से भी सवाल है कि वे इस समस्या के समाधान के लिए कौन-सी व्यावहारिक पहल कर रहे हैं।

प्रचंड प्रहार की बात

गौमाता की सुरक्षा हो, वन्यजीवों का संरक्षण हो या आम नागरिकों को स्वच्छ पर्यावरण उपलब्ध कराने का सवाल—प्लास्टिक प्रदूषण किसी एक वर्ग की समस्या नहीं, सबकी चिंता है। कानून बनाना जरूरी है, लेकिन उसका प्रभावी क्रियान्वयन, नियमित निगरानी और परिणामों की सार्वजनिक जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है।

सरकार और प्रशासन के लिए असली कसौटी जब्ती और जुर्माने के आंकड़े भर नहीं, बल्कि प्रतिबंधित प्लास्टिक की उपलब्धता में कमी, बेहतर कचरा प्रबंधन और प्रदूषण के जोखिम में वास्तविक गिरावट है। आखिर कब ऐसी व्यवस्था बनेगी, जिसमें इस्तेमाल के बाद फेंकी गई एक पन्नी किसी बेजुबान की जान, किसी जलस्रोत की स्वच्छता या आम नागरिकों के पर्यावरणीय हितों के लिए खतरा न बने?

Prachand Prahar

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