रुपये पर सवाल, आंकड़ों पर जवाब! मंत्री बोले—पहले डाटा ठीक करो; सवाल फिर भी कायम
बिलासपुर प्रेस कॉन्फ्रेंस में रुपये की गिरावट को लेकर पत्रकार का सवाल—वायरल वीडियो में 68% का आंकड़ा चर्चा में, लेकिन BBC के आंकड़े में गिरावट 62.33%; अब सवाल सही आंकड़े से आगे, जवाबदेही पर

प्रचंड प्रहार न्यूज नेटवर्क/बिलासपुर।
प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के बिलासपुर प्रवास के दौरान आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस का एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में है। वीडियो में एक पत्रकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस पुराने बयान के संदर्भ में रुपये की गिरती कीमत को लेकर सवाल किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि किसी देश का रुपया गिरता है तो उसकी इज्जत भी गिरती है।

पत्रकार ने मनमोहन सिंह सरकार के दस वर्ष और नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट की तुलना करते हुए सवाल उठाया कि यदि रुपये की कमजोरी को देश की साख से जोड़कर देखा गया था, तो वर्तमान में रुपये की गिरती कीमत को लेकर सरकार का आकलन क्या है? सवाल के दौरान 68 प्रतिशत का आंकड़ा सामने आया, जिस पर स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने पत्रकार से कहा कि पहले अपना डाटा ठीक कर लें और सवाल किया कि “68 प्रतिशत गिरेगा तो कहां पहुंचेगा?”
68 नहीं, 62.33 प्रतिशत—आंकड़े में सुधार जरूरी
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और पोस्ट में 68 प्रतिशत का आंकड़ा चर्चा में है। हालांकि उपलब्ध BBC Hindi के आंकड़ों के अनुसार यह गिरावट 62.33 प्रतिशत बताई गई है। BBC की तुलना में 26 मई 2014 को डॉलर का भाव करीब ₹58.94 और मई 2026 में करीब ₹96 लिया गया है। इसी तरह BBC के अनुसार मनमोहन सिंह के दस वर्ष के कार्यकाल में रुपये की गिरावट 31.65 प्रतिशत रही।
क्या कहते हैं RBI के ऐतिहासिक आंकड़े
RBI के ऐतिहासिक आंकड़े भी बताते हैं कि वर्ष 2004 में अमेरिकी डॉलर का औसत मूल्य करीब ₹45.32 था, जबकि 2014 में यह करीब ₹61.03 रहा। इस लिहाज से 68 प्रतिशत का आंकड़ा सही नहीं है और उसे तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा। हालांकि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2014 से 2026 के बीच रुपये में लगभग 62.33 प्रतिशत की गिरावट का दावा अपने आप में एक गंभीर आर्थिक सवाल जरूर खड़ा करता है।
अब मुद्दा सिर्फ आंकड़े का नहीं, जवाब का भी है
यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि रुपये की कीमत केवल केंद्र सरकार की नीतियों से निर्धारित नहीं होती। अंतरराष्ट्रीय बाजार, डॉलर की मजबूती, कच्चे तेल की कीमत, विदेशी निवेश, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां और भू-राजनीतिक घटनाक्रम भी रुपये की चाल को प्रभावित करते हैं। इसलिए इसे सीधे किसी एक सरकार की आर्थिक विफलता का प्रमाण मानना भी उचित नहीं होगा। लेकिन लोकतंत्र में रुपये की गिरती कीमत पर सवाल उठाना निश्चित रूप से वैध आर्थिक और जनहित का सवाल है।
ऐसे में सवाल यह भी है—अगर पत्रकार का आंकड़ा गलत था, तो क्या प्रेस कॉन्फ्रेंस में सही आंकड़ा बताकर सवाल का पूरा जवाब नहीं दिया जा सकता था? क्या सरकार को यह नहीं बताना चाहिए कि रुपये पर दबाव के वास्तविक कारण क्या हैं और उसे नियंत्रित करने के लिए क्या रणनीति अपनाई जा रही है?
और सबसे अहम—
“डाटा गलत हो तो उसे सुधारिए… लेकिन सवाल का जवाब भी तो दीजिए!”
वायरल वीडियो में मंत्री द्वारा आंकड़े को लेकर आपत्ति जताने के बाद सवाल वहीं आगे नहीं बढ़ पाया। अब सोशल मीडिया पर बहस इस बात की है कि बहस 68 प्रतिशत बनाम 62.33 प्रतिशत की होनी चाहिए या फिर रुपये की वास्तविक स्थिति और उसके कारणों पर?
प्रचंड प्रहार न्यूज का सवाल सीधा है—
आंकड़ा गलत है तो सही आंकड़ा सामने रखिए,
रुपया कमजोर है तो कारण बताइए
और सवाल उठ रहा है तो जवाब भी दीजिए।



