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एक स्कूल खुला, बाकी की खिड़कियां कौन खोलेगा? एक शिकायत सामने आई, कितनी दबी हैं?

मल्हार की छात्राओं की शिकायत ने खोला सवालों का पिटारा—क्या जिले-प्रदेश के दूसरे स्कूलों में भी ‘सब ठीक’ की फाइल चल रही है?

प्रचंड प्रहार न्यूज नेटवर्क/बिलासपुर।

किसी स्कूल में बच्चे पढ़ने जाते हैं, अपनी शिकायत लेकर कलेक्ट्रेट नहीं। लेकिन जब विद्यालय में अपनी बात रखने के बाद भी समाधान की उम्मीद कमजोर पड़ जाए और छात्राओं को करीब 30 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय पहुंचकर अपनी आवाज उठानी पड़े, तो मामला सिर्फ एक स्कूल की शिकायत तक सीमित नहीं रहता।

मल्हार के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की छात्राओं द्वारा कथित अव्यवस्थाओं, फीस वसूली, सैनिटरी पैड से जुड़ी शिकायतों, प्राचार्य के कथित अभद्र व्यवहार और शिकायत करने पर परीक्षा में नुकसान अथवा कार्रवाई के डर जैसे आरोप सामने आने के बाद अब असली सवाल पूरी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर खड़ा होता है। यह सभी आरोप फिलहाल शिकायतकर्ताओं के आरोप हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। लेकिन सवाल यह है कि अगर एक विद्यालय की छात्राओं ने हिम्मत करके आवाज उठाई है, तो उन विद्यालयों का क्या जहां बच्चे शिकायत करने से पहले ही डर जाते हों?

एक मामला सामने आया, क्या बाकी भी ‘सब ठीक’ हैं?

मल्हार की छात्राओं ने आवाज उठाई—यह उनकी शिकायतों की सत्यता का स्वतः प्रमाण नहीं, लेकिन यह जरूर बताता है कि उन्होंने अपनी समस्याओं को अधिकारियों तक पहुंचाने का साहस किया।

अब शिक्षा विभाग के सामने इससे बड़ा सवाल खड़ा है।

क्या केवल इसी विद्यालय की जांच होगी या जांच का दायरा उन तमाम सरकारी और निजी विद्यालयों तक भी जाएगा जहां विद्यार्थी इसी तरह की समस्याओं का सामना कर रहे हों?

👉 क्योंकि हर बच्चा शिकायत लेकर कलेक्ट्रेट तक नहीं पहुंच सकता।

👉 कुछ बच्चे चुप रह जाते हैं।

👉 कुछ अभिभावकों को बताने से डरते हैं।

👉 कुछ शिकायत करने के बाद संभावित परेशानी की आशंका में पीछे हट सकते हैं।

👉 और कुछ शायद यह मानकर चुप हो जाते हैं कि “कौन सुनेगा?”

यदि ऐसी कोई स्थिति कहीं मौजूद है तो वह सामने आना जरूरी है।

शिकायत पेटी काफी है या उसकी चाबी भी चाहिए?

विद्यालयों में शिकायत व्यवस्था, बाल सुरक्षा तंत्र और विद्यार्थियों की समस्याओं के समाधान के लिए व्यवस्थाएं बनाई जाती हैं। लेकिन असली परीक्षा कागज पर बनी व्यवस्था की नहीं, बल्कि उसकी जमीनी पहुंच और निष्पक्षता की है।

कहीं ऐसा तो नहीं कि शिकायतों की व्यवस्था मौजूद है, लेकिन शिकायत करने वाला विद्यार्थी ही अपने भविष्य को लेकर आशंकित हो?

यदि किसी विद्यार्थी को यह डर हो कि शिकायत करने से उसके परीक्षा परिणाम, व्यवहार या विद्यालय में उसके साथ होने वाले व्यवहार पर असर पड़ सकता है, तो फिर शिकायत व्यवस्था का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है।

यह किसी विशेष विद्यालय या व्यक्ति के बारे में निष्कर्ष नहीं है, बल्कि पूरी शिकायत-निवारण प्रणाली की स्वतंत्र समीक्षा की जरूरत का सवाल है।

‘सब ठीक है’ की रिपोर्ट से आगे बढ़ना होगा

प्रशासनिक निरीक्षण का उद्देश्य केवल रिकॉर्ड देखना नहीं होना चाहिए। अब जरूरत इस बात की है कि शिक्षा विभाग चाहे तो जिले के विद्यालयों में स्वतंत्र और गोपनीय विद्यार्थी फीडबैक व्यवस्था के माध्यम से वास्तविक स्थिति जाने।

छात्राओं और छात्रों से सीधे पूछा जाए—

– क्या विद्यालय में किसी तरह की अवैध या अनावश्यक फीस ली जा रही है?

– क्या शासन की योजनाओं और विद्यार्थियों को मिलने वाली सुविधाएं वास्तव में मिल रही हैं?

– क्या छात्राएं स्वास्थ्य एवं स्वच्छता संबंधी सुविधाओं से संतुष्ट हैं?

– क्या शिकायत करने पर किसी प्रकार के दबाव या प्रतिकूल व्यवहार की आशंका रहती है?

– क्या विद्यालय स्तर पर शिकायतों का निष्पक्ष समाधान होता है?

– क्या विद्यार्थी बिना डर के अपनी बात अधिकारियों तक पहुंचा सकते हैं?

इन सवालों के जवाब कागजी निरीक्षण से नहीं, विद्यार्थियों की गोपनीय और स्वतंत्र आवाज से ज्यादा स्पष्ट हो सकते हैं।

मल्हार की शिकायत सिर्फ शुरुआत का संकेत न बन जाए

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस मामले में कार्रवाई का अर्थ केवल दोषी तलाशना नहीं होना चाहिए। यदि जांच में शिकायतें सही पाई जाती हैं तो नियमानुसार कार्रवाई हो; यदि आरोप तथ्यहीन पाए जाते हैं तो वह तथ्य भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाए।

लेकिन जांच यहीं खत्म नहीं होनी चाहिए।

मल्हार में जो सामने आया है, वह एक मामला है। सवाल उन मामलों का है जो सामने नहीं आए।

शिक्षा विभाग और प्रशासन चाहे तो इसे एक अवसर बना सकता है—एक ऐसी व्यापक समीक्षा का, जिसमें जिले के अन्य विद्यालयों की वास्तविक स्थिति भी जांच के दायरे में आए।

क्योंकि किसी व्यवस्था की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितनी शिकायतें सामने आईं, बल्कि इससे कि शिकायत करने से पहले किसी बच्चे को डरना न पड़े।

प्रशासन के लिए सबसे बड़ा सवाल

छात्राओं को अपनी बात रखने के लिए कलेक्ट्रेट तक क्यों आना पड़ा—इसका जवाब केवल मल्हार के स्कूल से नहीं, बल्कि पूरी शिकायत-निवारण व्यवस्था से मांगा जाना चाहिए।

और यदि जांच में किसी विद्यालय में अनियमितता, अनुचित व्यवहार या विद्यार्थियों के अधिकारों से जुड़ी कोई गड़बड़ी सामने आती है, तो उसे समय रहते उजागर करना ही प्रशासन की जिम्मेदारी होगी।

क्योंकि आज एक स्कूल की शिकायत सामने आई है। कल किसी दूसरे स्कूल की आवाज न दबे—यह सुनिश्चित करना ही असली प्रशासनिक परीक्षा है।

प्रचंड प्रहार का सवाल

“एक स्कूल की शिकायत पर जांच होगी… लेकिन जिन स्कूलों में शिकायत करने वाला कोई नहीं, उनकी खबर कौन लेगा?”

यही वह सवाल है, जिसका जवाब अब केवल फाइलों में नहीं, जमीन पर दिखाई देना चाहिए।

Prachand Prahar

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